अटूट श्रद्धा – विश्वास और समर्पण

हममें से ज़्यादातर लोग साधना तो करते हैं, लेकिन अक्सर उसका उद्देश्य केवल अपनी इच्छाएँ पूरी करवाना होता है। हम देवताओं से मिन्नतें करते हैं, मंत्र जपते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, पर अपने मन के भीतर इष्ट देव और साधना के प्रति सच्ची श्रद्धा और पूरा विश्वास पैदा नहीं कर पाते। यही कारण है कि ऐसी साधना धीरे-धीरे केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाती है, जिसमें आत्मा का भाव नहीं होता।

श्रद्धा मनुष्य के पास मौजूद सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। इस शक्ति के सहारे इंसान भौतिक जगत में भी असंभव-सा लगने वाला काम कर सकता है। लेकिन समस्या यह है कि हम इस शक्ति का सही उपयोग करना नहीं जानते। इतिहास और पुराण इस बात के साक्षी हैं कि श्रद्धा के बल पर ब्राह्मण वरदान और शाप देने में समर्थ हुए। श्रद्धा के कारण ही रामकृष्ण परमहंस को पत्थर की काली माँ सजीव प्रतीत हुई। श्रद्धा के बल पर ही भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु स्तंभ से प्रकट हुए। और श्रद्धा के कारण ही एकलव्य ने मिट्टी के द्रोणाचार्य से वह विद्या सीख ली, जो असली द्रोणाचार्य भी उसे नहीं सिखा सके।

श्रद्धा में अपार शक्ति है। इसके चमत्कारों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। लेकिन याद रखिए, श्रद्धा एक ऐसा तत्व है जिसका उपयोग अच्छे और बुरे – दोनों तरह से किया जा सकता है। यह बात एक छोटी-सी कहानी से आसानी से समझी जा सकती है।

एक गाँव में कुछ दोस्त आपस में एक पुराने भूत बंगले की चर्चा कर रहे थे। उनका कहना था कि आज तक कोई भी उस बंगले में जाकर ज़िंदा वापस नहीं आया। उन्हीं दिनों शहर से उनका एक दोस्त “बहादुर” गाँव आया हुआ था। जब उसने यह बात सुनी तो ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा और बोला – “ये सब बेकार की बातें हैं, भूत-प्रेत कुछ नहीं होते।”

दोस्तों ने कहा, “ठीक है, अगर तू सच में नहीं मानता तो आज रात 12 बजे उस भूत बंगले में जाकर एक कील ठोक कर आ जा।”
बहादुर ने गर्व से कहा, “ठीक है, मैं अभी ये साबित कर दूँगा।”

रात के 12 बजे, कड़ाके की ठंड और सन्नाटे के बीच सभी दोस्त इकट्ठा हुए। पूरा गाँव सो रहा था। बहादुर कंबल ओढ़े, हथौड़ी और कील लेकर बंगले की ओर चल पड़ा। बाहर से भले ही वह बहादुर दिख रहा था, लेकिन मन ही मन डर भी रहा था। फिर भी अपनी शान के लिए वह आगे बढ़ता गया।

तेज़ हवाएँ चल रही थीं, अंधेरा चारों ओर फैला हुआ था। बंगले में प्रवेश करते ही कुछ पक्षी उड़ गए, जिससे वह चौंक गया। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। ठंड के बावजूद पसीना बहने लगा। किसी तरह हिम्मत जुटाकर वह नीचे बैठा और कील ठोकने लगा। अंधेरे में उसे पता ही नहीं चला कि कील उसके कंबल को जमीन से जोड़ रही है।

जैसे ही वह उठकर भागने लगा, उसे लगा कि किसी ने पीछे से पकड़ लिया है। बस, यही सोचते ही उसके प्राण निकल गए। जबकि वहाँ न कोई भूत था, न प्रेत।

यही है श्रद्धा की शक्ति।
जब तक बहादुर को विश्वास नहीं था कि भूत होते हैं, तब तक वह केवल थोड़ा डरा हुआ था। लेकिन जैसे ही उसके मन में यह विश्वास बैठ गया कि “मुझे भूत ने पकड़ लिया है”, उसी क्षण उसका अंत हो गया।

इससे हमें यह सीख मिलती है कि अगर हम अपने डर पर श्रद्धा और विश्वास कर लें, तो वह हमें नुकसान पहुँचा सकता है। और अगर हम किसी दैवीय शक्ति, मंत्र या साधना पर श्रद्धा और विश्वास करें, तो वही हमें लाभ भी पहुँचा सकता है।

आप चाहे किसी भी देवता की साधना करें, आपका इष्ट चाहे कोई भी हो, लेकिन यदि आपकी साधना श्रद्धा से खाली है, तो उससे कोई फल नहीं मिल सकता। इसलिए यदि आप सच में किसी दैवीय शक्ति की कृपा पाना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने अंतःकरण में श्रद्धा का बीज बोइए। उसे विश्वास और समर्पण से लगातार सींचते रहिए। तभी आपको वही फल मिलेगा, जिसका वर्णन हमारे शास्त्रों और साधना के महात्म्य में किया गया है। …और जब श्रद्धा का यह बीज भीतर जमने लगता है, तब साधना केवल मंत्रों का उच्चारण नहीं रह जाती, वह साधक के जीवन की साँस बन जाती है। उस समय भगवान बाहर कहीं नहीं होते, वे साधक के हृदय में उतर आते हैं। आँखें बंद करने पर भी उनका स्पर्श महसूस होने लगता है, और आँखें खोलने पर भी संसार में वही दिखाई देने लगते हैं।

श्रद्धा हमें सिखाती है कि ईश्वर को मजबूर नहीं किया जा सकता, बल्कि उन्हें प्रेम से बुलाया जाता है। जब हम शर्तों के साथ पूजा करते हैं – “हे प्रभु, यह दे दो, वह कर दो” – तब हम व्यापारी बन जाते हैं, भक्त नहीं। लेकिन जब आँखों में आँसू, मन में समर्पण और हृदय में अटूट विश्वास होता है, तब बिना माँगे भी सब कुछ मिल जाता है।

कई बार साधक निराश हो जाता है। वह कहता है – “मैं तो रोज़ पूजा करता हूँ, फिर भी कुछ नहीं बदला।” उसे कोई यह नहीं बताता कि पूजा बाहर हो रही है, भीतर नहीं। भीतर अब भी शंका है, भय है, अधीरता है। श्रद्धा समय माँगती है, परीक्षा लेती है। जैसे सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है, वैसे ही साधक भी कठिनाइयों की आँच में तपकर परिपक्व होता है।

जब जीवन में दुख आता है, वही समय श्रद्धा की असली परीक्षा होती है। सुख में तो हर कोई भगवान को याद कर लेता है, पर दुख में भी “सब ठीक है, मेरे इष्ट जो करेंगे, वही मेरे लिए श्रेष्ठ होगा” – यह भाव ही सच्ची श्रद्धा है। जिस दिन यह भाव आ गया, उस दिन समझ लेना कि साधना ने दिशा पकड़ ली है।

श्रद्धा हमें डर से मुक्त करती है, और डर हमें श्रद्धा से दूर ले जाता है। बहादुर की कहानी हमें यही सिखाती है कि विश्वास जिस ओर जुड़ जाए, जीवन उसी दिशा में मुड़ जाता है। अगर डर पर विश्वास करेंगे, तो डर हमें निगल जाएगा। और अगर ईश्वर पर विश्वास करेंगे, तो वही ईश्वर हमारी ढाल बन जाएगा।

इसलिए साधना शुरू करने से पहले एक ही प्रश्न अपने आप से पूछिए –
“क्या मैं सच में अपने इष्ट पर भरोसा करता हूँ?”
अगर उत्तर हाँ है, तो मार्ग कठिन होने पर भी मंज़िल निश्चित है। और अगर उत्तर नहीं है, तो पहले श्रद्धा को जन्म दीजिए, साधना अपने आप फल देने लगेगी।

याद रखिए, ईश्वर दूर नहीं हैं। दूरी हमारे मन की शंका बनाती है। जिस दिन शंका का पर्दा हट गया, उसी दिन दर्शन भी हो जाएगा। श्रद्धा कोई शब्द नहीं, कोई सिद्धांत नहीं – यह तो हृदय की वह पुकार है, जिसे सुनकर स्वयं परमात्मा दौड़े चले आते हैं।

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